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हिमालयी नीति बनाने से क्यों बच रही है सरकार…

सुरेश उपाध्याय
नई दिल्ली: इस साल मौसम के बिगड़े मिजाज ने देश के पहाड़ी राज्यों, खासकर हिमाचल और उत्तराखंड में तबाही मचा दी है। धराली से लेकर किश्तवाड़, कुल्लू, मनाली, मंडी और देहरादून में सहस्रधारा, मालदेवता और अब नंदानगर…। भारी बारिश और बादल फटने की घटनाओं से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के साथ ही जम्मू-कश्मीर में भी जन-धन का भारी नुकसान हुआ है। पूर्वोत्तर के राज्यों में भी बाढ़ और बारिश ने खासा नुकसान पहुंचाया है। इसे देखते हुए एक बार फिर हिमालयी नीति बनाने की मांग उठ रही है। पर्यावरण प्रेमी लंबे अर्से से एक हिमालयी नीति बनाने की मांग सरकार से कर रहे हैं, लेकिन इसे लगातार अनसुना किया जा रहा है। सरकार से कहा जा रहा है कि वह हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए यहां परियोजनाओं और भवन निर्माण के मानक तय करे। तय करे कि किस स्थान पर किस सीमा तक निर्माण किया जा सकता है। इलाके के जंगलों और नदियों को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है। कैसे प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना स्थानीय आबादी को जरूरी सुविधाएं मुहैया कराई जा सकती हैं।

क्लाइमेट चेंज से बर्बादी

इसमें दो राय नहीं कि भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम इलाकों में क्लाइमेट चेंज बड़ी तबाही लेकर आ रहा है। इसकी वजह से कहीं बादल फट रहे हैं तो कहीं भारी बाढ़, बारिश और गर्मी देखी जा रही है। हाल के सालों में बादल फटने की बड़ी घटना 2010 में लेह में हुई थी। इसके कारण वहां भारी तबाही हुई। इसके बाद तो देश में अब तक सैकड़ों जगह बादल फट चुके हैं। इससे पहले देश में इस तरह की घटनाएं बहुत कम हुई थीं। चीन, अमेरिका, रूस और कई अन्य देशों में भी असामान्य बारिश और भूस्खलन से खासा नुकसान हो रहा है। आज यूरोप के कई ठंडे देश गर्मी से बेहाल हैं। यानी कि क्लाइमेट में बदलाव पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या बन रहा है और इससे निपटने के लिए सभी देशों को प्रयास करने होंगे।

अंधाधुंध निर्माण भी तबाही की वजह

क्लाइमेट चेंज तो बर्बादी की वजह बन ही रहा है, देश के पहाड़ी राज्यों में पिछले कुछ सालों में विकास के नाम पर जिस तरह से अंधाधुंध निर्माण कार्य हो रहे हैं, पेड़ काटे जा रहे हैं, पहाड़ को बर्बाद करने लगे हैं। डर इस बात का है कि इसके कारण आने वाले समय में पहाड़ का हर इलाका कहीं जोशीमठ न बन जाए। जोशीमठ भूस्खलन के मलबे पर बसा शहर है। बावजूद इसके, यहां निजी और सरकारी स्तर पर बड़े-बड़े निर्माण कर दिए गए। और तो और शहर के पास एक पनबिजली परियोजना बनाने की भी मंजूरी दे दी गई और इसकी टनल शहर के नीचे से गुजारी जा रही है, वह भी विस्फोट करके। स्थानीय आबादी की हर मांग को अनसुना किया जा रहा है।

पर्यटन के नाम पर तबाही

पहाड़ों में इस समय पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर बड़े-बड़े होटल, रिजार्ट्स और अन्य प्रोजेक्ट्स बना दिए गए हैं। पहाड़ की जमीन इतना बोझ उठाने में सक्षम नहीं है। बहुत ज्यादा लोगों की आवाजाही बढ़ने से पहाड़ों की जलवायु पर भी असर पड़ रहा है और इससे जो अराजकता फैल रही है, वह अलग है। इस बार भी गढ़वाल में सरकार की ऑल वेदर रोड का जो हश्र हुआ है, वह यह बताने के लिए काफी है कि पहाड़ कितने संवेदनशील हैं। हिमालय का इलाका वैसे भी दुनिया की सबसे नई संरचना है और भूगर्भीय लिहाज से काफी संवेदनशील भी। बावजूद इसके, यहां हजारों बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दी गई हैं और स्थानीय प्रशासन को यह सब दिखाई नहीं दिया। उत्तराखंड में तो जमीनों की लूट मची हुई है। बाहरी लोग यहां आकर बड़े पैमाने पर निर्माण करा रहे हैं। मुक्तेश्वर, रामगढ़ के इलाके के साथ ही तमाम जगहों पर ऊंची पहाड़ियों तक पर कई-कई मंजिला इमारतें, होटल और रिजॉर्ट बन गए और कोई देखने वाला नहीं है। किसी को यह नहीं दिख रहा है कि पहाड़ इतना बोझ उठाने के काबिल नहीं हैं। यहां नदी, नालों तक में घुसकर मकान बनाए जा रहे हैं और पेड़-पौधों का जो नुकसान हो रहा है, वह अलग है। सड़कों को अवैज्ञानिक तरीके से चौड़ा किया जा रहा है। नतीजा भूस्खलन के रूप में सामने आ रहा है। पर्यावरणविदों का कहना है कि सरकार को अगर हिमालयी क्षेत्र को बचाना है तो इसके लिए ठोस नीति बनाने के अलावा और कोई चारा नहीं है।

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