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BRICS की आड़ में चीनी सामान और AI की एंट्री? चिनफिंग के ‘5-पॉइंट प्लान’ को लेकर भारत सतर्क

नई दिल्ली: ब्रिक्स सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा पेश किया गया नया 5-सूत्रीय एक्शन प्लान भारतीय नीति निर्माताओं की टेंशन बढ़ा सकती है। इन प्रस्तावों से उत्साहित होने की संभावना कम है। चीन के BRICS की अध्यक्षता संभालने से पहले, शिखर सम्मेलन के समापन सत्र में शी जिनपिंग का भाषण इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वे अगले साल होने वाले सम्मेलन के एजेंडे में इन पहलुओं को शामिल करने पर पूरा जोर देंगे। अब चर्चा ये हो रही है कि कहीं इस एक्शन प्लान के तहत चीन का अपना दबदबा कायम करने का हिडन एजेंडा तो नहीं छिपा है? क्या चीनी राष्ट्रपति केवल अपने फायदे की बात कर गए?

क्या है चीन का 5 सूत्रीय एक्शन प्लान

  • चीन का एआई मॉडल: चीन के एआई मॉडल से डेटा सुरक्षा का खतरा
  • एकीकृत बाजार का प्लान: ‘एकीकृत बाजार’ की आड़ में चीनी सामान की डंपिंग और मार्केट में दबदबा बनाने की कोशिश
  • SEZ पार्टनरशिप: स्पेशल इकोनॉमिक जोन पार्टनरशिप पर ‘बेल्ट एंड रोड’ (BRI) का साया
  • चीन का सप्लाई चेन का प्लान: चीन एक ऐसा सप्लाई चेन तैयार करने की कोशिश में हैं जिसमें बाजार पर एकाधिकार का डर बन रहा है।
  • टेक्नोलॉजी: चीन अपनी टेक्नोलॉजी के हिसाब से दुनिया को कंट्रोल करना चाहता है।

चीनी बाजार को फायदा पहुंचाने की कोशिश

बता दें कि लंबे समय से ब्रिक्स (BRICS) एक ट्रेडिंग ब्लॉक बनने से दूर रहा है। टैरिफ में कटौती और निवेश सुरक्षा नियमों के जरिए बाजारों को आपस में जोड़ने से चीनी सामान और कंपनियों के लिए बाजार बिना ज्यादा सुरक्षा उपायों के खुल सकते हैं, जिससे घरेलू टेक्नोलॉजी और कंपनियों के विकास पर खतरा पैदा हो सकता है। भारत ने चीनी निवेश पर कड़ी नजर रखी है और हर मामले की अलग-अलग जांच के बाद ही उन्हें मंजरी दी है। साथ ही, इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों की जबरदस्त लॉबिंग के बावजूद भारत ने अपनी सतर्कता में कोई ढील नहीं दी है।

दुनिया के बाजारों पर चीन के कब्जे का डर

बाजारों पर चीन के कब्जे का डर सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसे दुनिया भर में जापान से लेकर यूरोप और अमेरिका तक महसूस किया जा रहा है। कई देश चीन पर अपनी निर्भरता कम करने और अलग-अलग जगहों से सामान मंगाने (सोर्सिंग में विविधता लाने) की कोशिश कर रहे हैं। असल में, भारत ने जो कई फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (मुक्त व्यापार समझौते) किए हैं, उनके पीछे कुछ हद तक आयात के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति है। साथ ही, सरकार कम टैरिफ और बाजार में प्रवेश की कम बाधाओं के ज़रिए भारतीय उत्पादों की मांग को भुनाने की कोशिश भी कर रही है।

2019 में ही भारत को होगा था ऐहसास

नवंबर 2019 में RCEP से बाहर निकलने के बाद से क्योंकि भारत को डर था कि इससे चीनी सामानों का आयात बहुत बढ़ जाएगा और ट्रेड डील भारत के लिए पॉलिसी का एक अहम जरिया बन गई हैं। RCEP में चीन का दबदबा ही वह मुख्य कारण था जिसकी वजह से भारत ने इस समझौते से अलग होने का फैसला किया, जबकि जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान (ASEAN) देशों के साथ उसके पहले से ही ट्रेड डील मौजूद थे। तब से, भारत के पोर्टफोलियो का दायरा बढ़ा है और इसमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, UAE, UK, EU और EFTA देशों के साथ FTA भी शामिल हो गए हैं।

भारत के लिए 5 बड़ी चुनौती

  • आर्थिक निर्भरता का खतरा (एकीकृत बाजार)
  • डिजिटल संप्रभुता और डेटा सुरक्षा (ओपन-सोर्स AI प्लेटफॉर्म)
  • चीन की अध्यक्षता में एजेंडा हाईजैक होने का डर
  • भू-राजनीतिक हथियार
  • भारत के लिए इसका विरोध करना कूटनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा

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