क्या अगर डिप्टी डायरेक्टर आनंद मोहन कुछ और दिन पद पर रहे तो नोएडा में सूखा पड़ जाएगा?

क्या नोएडा के पेड़-पौधे पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे?
क्या होगा “ग्रीन नोएडा, क्लीन नोएडा” का?
क्या आनंद मोहन, डिप्टी डायरेक्टर की सेवा समाप्त कर देनी चाहिए?
आखिर सेवा समाप्त भी क्यों न हो — इनके रहते हॉर्टिकल्चर विभाग का बेड़ा गर्क हो गया।
ग्रीन नोएडा का ‘नारा फेल’
कागज़ों में जंगल, करोड़ों का खेल!
44 फीसदी पेड़ सूखे — कहाँ गई हरियाली?
नोएडा में ‘ग्रीन फेल’ का बड़ा खुलासा: कागज़ों में हरियाली, ज़मीन पर सूखा!
नोएडा से एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है, जहां “ग्रीन नोएडा, क्लीन नोएडा” का नारा अब सवालों के घेरे में है। हॉर्टिकल्चर विभाग की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लग रहे हैं, और डिप्टी डायरेक्टर आनंद मोहन के कार्यकाल को लेकर भी तीखी बहस छिड़ गई है।
क्या नोएडा सूखने की कगार पर है?
शहर के कई सेक्टरों में हरियाली की हालत बेहद खराब बताई जा रही है। ग्राउंड रिपोर्ट्स के मुताबिक हालात चिंताजनक हैं:
सेक्टर 44: करीब 44% पेड़ सूख चुके, घास पूरी तरह गायब
सेक्टर 132: 50% पौधे खराब, कूड़े में आग लगने की घटनाएं
सेक्टर 135: 35% पेड़ सूखे, चारों तरफ गंदगी और आवारा पशु
सेक्टर 137, 128, 81, 80: ग्रीन बेल्ट बदहाल, रखरखाव न के बराबर
सेक्टर 125: ग्रीन बेल्ट को पार्किंग में बदला जा रहा है
सिंचाई और देखरेख पूरी तरह नदारद
स्थानीय लोगों का कहना है कि पेड़ों और पौधों की नियमित सिंचाई नहीं हो रही। ग्रीन एरिया में कूड़ा जमा है, और कहीं-कहीं तो आग तक लगाई जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हरियाली क्यों नहीं बच पा रही?
‘कागज़ों में जंगल, हकीकत में सूखा’
प्राधिकरण के दावे और ज़मीनी सच्चाई में बड़ा अंतर नजर आ रहा है। जहां रिपोर्ट्स में हरियाली दिखाई जाती है, वहीं असल में सूखे पेड़, बंजर ज़मीन और अव्यवस्था देखने को मिल रही है।
क्या होगी कार्रवाई?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या इस “ग्रीन फेल” पर कोई ठोस कार्रवाई होगी?
या फिर यूं ही सूखता रहेगा नोएडा?
डिप्टी डायरेक्टर आनंद मोहन की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। कई लोग उनकी जवाबदेही तय करने और सेवा समाप्त करने की मांग कर रहे हैं। हालांकि, किसी भी कार्रवाई के लिए आधिकारिक जांच और तथ्यात्मक पुष्टि जरूरी होगी।
निष्कर्ष
नोएडा की पहचान उसकी प्लानिंग और हरियाली से रही है। लेकिन अगर यही हाल रहा, तो “ग्रीन नोएडा” सिर्फ एक नारा बनकर रह जाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर क्या कदम उठाता है।



