गौतमबुद्ध यूनिवर्सिटी छात्र को नोटिस भेजने वाले एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कौन हैं? शासन ने रवि शंकर मिश्रा को निलंबित किया

नई दिल्ली। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आज सुप्रीम कोर्ट में बताया कि ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को सस्पेंड कर दिया गया है। उन्होंने एक छात्र को कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध-प्रदर्शन के लिए कथित तौर पर कैंपेन चलाने के मामले में 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड भरने के लिए शो-कॉज नोटिस जारी किया था।
गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षत त्रिपाठी ने बीएनएसएस की धारा 130 के तहत एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा जारी नोटिस को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की थी। इस याचिका का जवाब देते हुए एसजी ने यह बयान दिया।
‘अधिकारियों तक जाना चाहिए कड़ा संदेश’
सीनियर एडवोकेट पीवी दिनेश ने जुलाई में हुए छात्र विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े दूसरे मामलों की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने यह याचिका पेश की।
सीनियर वकील ने बेंच से याचिका पर विचार करने का आग्रह करते हुए कहा, “अधिकारियों तक एक कड़ा संदेश जाना चाहिए।” दिनेश ने इस बात पर जोर दिया कि नोटिस में कहा गया था कि वह छात्रों के बीच सरकार-विरोधी और गुमराह करने वाली बातें कर रहे थे और उनसे एक बॉन्ड भरने के लिए कहा गया था।
याचिका में क्या कहा गया?
याचिका के अनुसार, नोटिस में बीएनएसएस की धारा 126 का इस्तेमाल किया गया था। यह धारा एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को शांति बनाए रखने के लिए सिक्योरिटी मांगने का अधिकार देती है, जब ऐसी जानकारी हो कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या सार्वजनिक शांति में खलल डाल सकता है।
इसमें धारा 135 का भी इस्तेमाल किया गया था, जो ऐसी जानकारी की सच्चाई की जांच का प्रावधान करती है। नोटिस में छह महीने के लिए 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही रकम की दो जमानतें देने का प्रस्ताव था।
सीजेआई ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत ने बताया कि जब कल उनके सामने यह मामला उठाया गया था तो उन्होंने इस पर कड़ा रुख अपनाया था और राज्य से जवाब मांगा था। इसके बाद एसजी तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि उस अधिकारी को सस्पेंड कर दिया गया है।
यह नोटिस इको फर्स्ट पुलिस स्टेशन के एक सब-इंस्पेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर जारी किया गया था। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि त्रिपाठी छात्रों के बीच सरकार-विरोधी और गुमराह करने वाली बातें फैला रहे थे और उन्हें प्रस्तावित सीजेपी धरने में शामिल होने के लिए उकसा रहे थे।
रिपोर्ट में क्या कहा गया?
रिपोर्ट में कहा गया था कि इससे काफी तनाव पैदा हो गया था और छात्र आपस में लड़-झगड़ सकते थे, जिससे शांति और कानून-व्यवस्था भंग हो सकती थी।
त्रिपाठी की याचिका में कहा गया है कि नोटिस में ऐसी किसी खास तारीख, समय, बयान, प्रत्यक्ष कार्रवाई या असल या आसन्न हिंसा की घटना का जिक्र नहीं था जिसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा सके। इसमें यह भी कहा गया है कि आरोपों के समर्थन में उन्हें कोई भी सामग्री उपलब्ध नहीं कराई गई थी।
याचिका में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया को भी चुनौती दी गई है। 4 सितंबर के नोटिस में त्रिपाठी के पेश होने के लिए 5 सितंबर की तारीख तय की गई थी। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि उन्हें वकील करने, आरोपों को समझने और 5 लाख रुपये की जरूरी जमानत का इंतजाम करने के लिए मुश्किल से एक दिन का समय दिया गया था।
याचिका में कहा गया है कि ये कार्यवाही सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के उस आदेश के खिलाफ है, जिसमें छात्रों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़ी एफआईआर को रद कर दिया गया था और छात्रों के खिलाफ जबरदस्ती कार्रवाई करने पर रोक लगा दी गई थी।
इसमें यह भी तर्क दिया गया है कि त्रिपाठी पर जो आरोप लगाया गया है वह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने के अधिकार के दायरे में आता है।



