JPNIC घोटाले की जांच फिर तेज, LDA के तत्कालीन चीफ इंजीनियर और अधिशासी अभियंता तलब

लखनऊ के गोमती नगर स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (JPNIC) प्रोजेक्ट में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं और बजटीय गड़बड़ियों को लेकर प्रशासनिक जांच के दायरे में आए दो पूर्व मुख्य अभियंताओं की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
इस हाई-प्रोफाइल मामले की निष्पक्ष समीक्षा और विभागीय जांच को तार्किक अंजाम तक पहुंचाने के लिए दोनों अधिकारियों को 7 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आधिकारिक नोटिस जारी किया गया है।
यह सुनवाई मंडलायुक्त की अध्यक्षता में गठित विशेष जांच समिति के सामने संपन्न होगी। पूर्व में सामने आई तकनीकी और वित्तीय ऑडिट रिपोर्टों में इस प्रोजेक्ट के बजट आवंटन, सामग्री की खरीद और निर्माण कार्य की समय-सीमा को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए गए थे।
इसी सिलसिले में दोनों पूर्व इंजीनियरों को अपनी भूमिका और निर्णयों को लेकर स्पष्टीकरण देने के लिए यह अंतिम अवसर दिया गया है। शासन के कड़े रुख को देखते हुए माना जा रहा है कि इस सुनवाई के बाद मामले में बड़ी विभागीय या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
जांच समिति के सूत्रों के अनुसार, इन अधिकारियों पर तत्कालीन स्वीकृत बजट से अधिक राशि खर्च करने और बिना सक्षम वित्तीय स्वीकृति के प्रोजेक्ट के कई हिस्सों में बदलाव करने के आरोप हैं। 7 जुलाई की इस आमने-सामने की जिरह में एलडीए के मौजूदा तकनीकी सेल के अधिकारी भी मौजूद रहेंगे, जो ऑडिट टीम द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर सीधे सवाल-जवाब करेंगे।
यह पूरा विवाद मुख्य रूप से अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल के दौरान शुरू हुए इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत में हुई अप्रत्याशित बढ़ोतरी और निर्माण की खराब गुणवत्ता से जुड़ा है।
शुरुआती दौर में इस केंद्र के निर्माण के लिए जो बजट तय किया गया था, बाद के वर्षों में तकनीकी संशोधनों के नाम पर उसे कई गुना बढ़ा दिया गया, लेकिन इसके बावजूद प्रोजेक्ट का काम तय समय सीमा में पूरा नहीं हो सका।
इसके अलावा, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) और शासन की विशेष तकनीकी टीमों द्वारा किए गए भौतिक सत्यापन में यह बात सामने आई थी कि कंक्रीट की गुणवत्ता और फिनिशिंग के काम में मानकों की घोर अनदेखी की गई थी।
राजनीतिक रूप से भी यह मामला तब गरमा गया जब समाजवादी पार्टी ने मौजूदा सरकार पर इस केंद्र की अनदेखी करने और बदले की भावना से जांच कराने के आरोप लगाए, जबकि प्रशासन का तर्क है कि जनता के पैसों के इस बड़े दुरुपयोग को लेकर जवाबदेही तय करना विधिक रूप से जरूरी है।



