नई दिल्लीराज्‍य

क्या पर्यावरण के लिए खतरा बन रही है हरियाली..?

सुरेश उपाध्याय
नई दिल्ली : क्या पर्यावरण के लिए किसी तरह का संकट पैदा कर सकती है हरियाली ? यह सोचने में थोड़ा अजीब सा लगता है, लेकिन चीन में हुए एक अध्ययन में इस तरह के नतीजे सामने आए हैं। यह अध्ययन पिछले चार दशकों के डेटा के आधार पर किया गया है। इसमें यह बात सामने आई है कि पिछले चार दशकों में धरती की हरियाली तेजी से बढ़ी है। उपग्रहों से मिली तस्वीरों और कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह साफ दिखा है कि दुनिया के लगभग दो-तिहाई हिस्सों में हरियाली बढ़ी है। पहली नजर में यह सुनने में बहुत अच्छा या सकारात्मक लगता है, क्योंकि अधिक हरियाली का अर्थ है अधिक ऑक्सीजन, बेहतर पर्यावरण और जलवायु संतुलन। लेकिन एक नए शोध ने इस हरियाली के साथ जुड़ी एक बड़ी और चिंताजनक सच्चाई को सामने रखा है।

चीनी विज्ञान अकादमी के शिनजियांग इंस्टीट्यूट ऑफo इकोलॉजी एंड जियोग्राफी के शोधकर्ताओं के द्वारा किए गए इस अध्ययन को कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरमेंट नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन में बताया गया है कि दुनिया भर में हरियाली तो बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ-साथ कई जगहों पर मिट्टी की नमी तेजी से घट रही है। यानी पेड़-पौधों का बढ़ना हमेशा पानी और मिट्टी के लिए फायदेमंद नहीं है।

कैसे किया गया अध्ययन ?
शोधकर्ताओं ने उपग्रहों के आंकड़ों का विश्लेषण और 12 अलग-अलग अर्थ सिस्टम मॉडल्स का उपयोग किया। यह अध्ययन 1982 से लेकर 2100 तक की अवधि को शामिल करता है। इतने बड़े पैमाने के आंकड़ों से वैज्ञानिक यह समझ पाए कि वनस्पति में बढ़ोतरी और मिट्टी के नमी के बीच वास्तविक संबंध क्या है।
अध्ययन में पाया गया कि दुनिया के 65.82 फीसदी इलाकों में जहां-जहां वनस्पति मौजूद है, वहां हरियाली में वृद्धि हुई है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, इनमें से लगभग आधे क्षेत्रों में मिट्टी की नमी घट गई है। इसे वैज्ञानिकों ने ‘ग्रीनिंग-ड्राइंग’ (हरियाली-सूखापन) पैटर्न कहा है। यह पैटर्न खासकर उन इलाकों में ज्यादा दिखाई दिया, जहां पहले से ही पानी की कमी है।

किन इलाकों में ज्यादा असर?
इसका ज्यादा असर मध्य अफ्रीका, मध्य एशिया, पूर्वी ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के मध्य और उत्तरी हिस्सों में देखने को मिला है। इन इलाकों में हरियाली बढ़ने के बावजूद मिट्टी लगातार सूख रही है। इसका मतलब है कि वनस्पति की वृद्धि पानी का संतुलन बिगाड़ रही है।
वहीं दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में हरियाली के साथ मिट्टी की नमी भी बढ़ी है। इस पैटर्न को ‘ग्रीनिंग-वेटिंग’ (हरियाली-नमी) कहा गया है। ऐसे क्षेत्रों में उत्तर अमेरिका के कुछ हिस्से, भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिणी साहेल क्षेत्र (अफ्रीका) शामिल हैं।

हरियाली कैसे सोख रही है मिट्टी की नमी?
आमतौर पर हम सोचते हैं कि पेड़-पौधों के बढ़ने से मिट्टी को पोषण मिलता है और उससे नमी बनी रहती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि जब किसी पानी की कमी वाले इलाके में अचानक से वनस्पति बहुत अधिक बढ़ती है तो पेड़-पौधे अपनी जरूरत के लिए ज्यादा पानी खींचते हैं। पौधे ट्रांस्पिरेशन के जरिए बड़ी मात्रा में पानी वायुमंडल में छोड़ते हैं। ज्यादा पेड़-पौधों का मतलब है कि मिट्टी से ज्यादा पानी खींचा जाएगा। इससे धीरे-धीरे मिट्टी सूखने लगती है और जल संकट बढ़ सकता है। शोध पत्र के हवाले से कहा गया है कि हरियाली हमेशा जल संसाधनों के लिए फायदेमंद नहीं होती। पानी की कमी वाले इलाकों में अधिक पेड़-पौधे मिट्टी की नमी को और तेजी से कम कर सकते हैं।

क्या खतरे हैं?
यदि यह ‘ग्रीनिंग-ड्राइंग’ पैटर्न जारी रहा तो आने वाले दशकों में कई इलाकों में गंभीर जल संकट पैदा हो सकता है। खासकर वे क्षेत्र जहां पहले से ही पानी की उपलब्धता सीमित है। खेती पर असर पड़ेगा क्योंकि मिट्टी की नमी फसल उत्पादन के लिए सबसे जरूरी है। जलवायु असंतुलन बढ़ सकता है, क्योंकि सूखी मिट्टी ज्यादा गर्मी सोखती है। पेयजल संकट गहराएगा और समाज पर सामाजिक-आर्थिक दबाव बढ़ेगा।

क्या किया जाना चाहिए?
संतुलित वनरोपण के तहत जहां पानी कम है, वहां स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पेड़ लगाने चाहिए। जल संरक्षण तकनीकें जैसे, बारिश के पानी का संचय एवं ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीकों को अपनाना जरूरी है। मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग, ऑर्गेनिक खेती और भूजल पुनर्भरण पर काम करना होगा। नीतिगत स्तर पर यह तय करना होगा कि कौन-सी जगह पर कितनी हरियाली टिकाऊ साबित होगी। समझना यह होगा कि धरती की हरियाली बढ़ना निश्चित रूप से एक अच्छी खबर है, लेकिन यह आधी सच्चाई है। अगर हरियाली के साथ मिट्टी की नमी कम होती है तो यह भविष्य में बड़े संकट का कारण बन सकती है। इसलिए हमें केवल पेड़ लगाने पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि जल और मिट्टी की उपलब्धता को समझकर ही पर्यावरणीय योजनाएं बनानी चाहिए।

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