उत्तर प्रदेशराज्‍य

अगर आप बीवी-बच्चों का खर्च नहीं उठा सकते तो शादी ही न करें; हाईकोर्ट की टिप्पणी

लखनऊ: अगर कोई शख्‍स परिवार का खर्चा नहीं उठा सकता, तो उसे शादी का ख्‍याल छोड़ देना चाहिए. पुरुषों को ये नेक नसीहत इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दी है. इलाहाबाद हाई कोर्ट का कहना है कि अगर किसी पुरुष ने शादी की है, तो उसे परिवार का खर्च उठाना ही पड़ेगा. शादी करने के बाद शख्‍स ये नहीं कह सकता कि वह अपने परिवार का पेट नहीं भर सकता है, ये उसकी कानूनी जिम्‍मेदारी है, जो उसे उठानी ही पड़ेगी. इस जिम्‍मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता है. इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक पति-पत्‍नी के बीच चल रहे विवाद के बीच दिये गए मेंटेनेंस के आदेश को लेकर आया है.

…तो उसे विवाह ही नहीं करना चाहिए

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेंटेनेंस (Maintenance) को लेकर पति द्वारा दाखिल याचिका को खारिज करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि कोई भी पति अपनी खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देकर पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को यह आशंका हो कि वैवाहिक संबंध खराब होने की स्थिति में वह परिवार का खर्च नहीं उठा पाएगा, तो उसे विवाह ही नहीं करना चाहिए. कोर्ट ने माना कि एक बार जब कोई पुरुष किसी महिला से शादी कर लेता है, तो वह कानून के तहत उसका भरण-पोषण करने के लिए बाध्य होता है. यह टिप्पणी जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की डिविजन बेंच ने अपीलकर्ता तेज बहादुर मौर्य की फर्स्ट अपील को खारिज करते हुए की है.

अदालत ने 4000 रुपये मेंटेनेंस का दिया था आदेश 

अपीलकर्ता ने यह अपील हाई कोर्ट में प्रयागराज फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ दायर की थी. फैमिली कोर्ट के एडिशनल प्रिंसिपल जज ने हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 24 के तहत आवेदन में आदेश दिया था जिसे पत्नी ने मुकदमा लंबित रहने तक मेंटेनेंस के लिए फाइल किया था. अपीलकर्ता पति तेज बहादुर मौर्य ने फैमिली कोर्ट के आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी. जिसमें उसे वैवाहिक विवाद लंबित रहने के दौरान पत्नी को मेंटेनेंस के रूप में 4,000 प्रति माह देने का निर्देश दिया गया था.

पति का आरोप पत्‍नी किसी और के साथ रह रही

हाई कोर्ट में पति के वकील ने दलील दी कि अपीलकर्ता की आर्थिक स्थिति कमजोर है और ट्रायल कोर्ट ने इस पहलू पर पर्याप्त विचार नहीं किया. साथ ही उसने यह आरोप भी लगाया कि उसकी पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ रह रही है और दोनों के बीच आपसी सहमति से अलगाव हो चुका है. सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने सभी तथ्यों और पक्षों के तर्कों पर उचित विचार किया था. कोर्ट ने पत्नी के इस बयान को भी संज्ञान में लिया कि वह अधिक शिक्षित नहीं है और उससे कथित रूप से धोखे से हलफनामा लिया गया. पत्नी ने यह भी कहा कि वह बच्चों का पालन-पोषण स्वयं कर रही है और उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है.

बच्‍चों के लिए अलग से मेंटेनेंस मांग सकती है पत्‍नी 

अदालत ने कहा कि मौजूदा समय में जीवन जीने के लिए 4,000 रुपये न तो अत्यधिक है और न ही पति की क्षमता से बाहर मानी जा सकती है. कोर्ट ने यह भी माना कि पति ने अपनी आय के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए. ट्रायल कोर्ट ने माना है कि पत्नी अपने बच्चों के मेंटेनेंस के लिए अलग से कार्रवाई शुरू करने के लिए आज़ाद है, लेकिन हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 24 के तहत, सिर्फ़ पति या पत्नी ही उस याचिका के लंबित रहने के दौरान एक दूसरे से मेंटेनेंस का दावा कर सकते हैं. कोर्ट ने पाया कि अभी तथ्यों पर विचार करने के बाद ट्रायल कोर्ट ने आदेश पारित किया है और अपीलकर्ता को हर महीने 4,000 रुपए भरण–पोषण देने का निर्देश दिया गया.  ट्रायल कोर्ट ने अपील करने वाले को बकाया पांच किश्तों में देने का भी निर्देश दिया.

सभी पक्षों को सुनने के कोर्ट ने कहा…

अपीलकर्ता के वकील की यह दलील कि अपील करने वाला खुद सिर्फ़ एक मज़दूर है (और इस बारे में इस कोर्ट को कोई और जानकारी नहीं दी गई) इस कोर्ट को सही नहीं लगती, क्योंकि एक बार जब कोई आदमी किसी औरत से शादी कर लेता है तो वह कानून के तहत उसका गुज़ारा करने के लिए बाध्य हो जाता है. हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए अपील को खारिज कर दिया और कहा कि जो व्यक्ति यह मानते हैं कि शादी विफल होने की स्थिति में वो अपनी पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण नहीं कर पाएंगे उन्हें विवाह नहीं करना चाहिए. हालांकि, एक बार विवाह करने के बाद वे अपनी खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देकर मुकदमे की सुनवाई के दौरान पत्नी के गुज़ारे की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई गंभीर त्रुटि नहीं पाई गई है. इसी आधार पर अपील को खारिज कर दिया गया.

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