संभल हिंसा आखिर कैसे भड़की, न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा, सामने आईं कई अहम बातें

संभल। 24 नवंबर 2024 को हुई संभल हिंसा सुनियोजित षड्यंत्र का परिणाम थी। न्यायिक जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 19 से 24 नवंबर के बीच भीड़ जुटाने और हिंसा की तैयारी की गई।
रिपोर्ट गवाहों के बयान, एफआईआर, पोस्टमार्टम, मेडिकल रिपोर्ट, एफएसएल, बैलिस्टिक रिपोर्ट, वीडियो, फोटोग्राफ और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर तैयार की गई है।
आयोग के अनुसार स्थानीय सांसद जियाउर्रहमान बर्क, जफर अली, मशहूद अली फारूकी, कासिम जमाल, लद्दन खान सहित अन्य व्यक्तियों की भूमिका षड्यंत्र में सामने आई, जबकि विधायक पुत्र सुहैल इकबाल के भीड़ में शामिल होने का उल्लेख किया गया है। हिंसा में बाहरी लोगों की भी भागीदारी थी और बड़ी संख्या में लोग हथियारों व पत्थरों के साथ पहुंचे।
यही नहीं, रिपोर्ट में पुलिस को भी क्लीनचिट मिली। इसमें मृतकों के स्वजन ने दर्ज एफआईआर में पुलिस फायरिंग से मौत का आरोप नहीं, बल्कि हिंसा के दौरान गोली लगने की बात दर्ज कराने का हवाला दिया गया।
साथ ही फोरेंसिक लैब (एफएसएल) आगरा की बैलिस्टिक रिपोर्ट और क्राइम सीन री-कंस्ट्रक्शन रिपोर्ट में पुलिस के घातक हथियार के इस्तेमाल की पुष्टि नहीं होने की बात है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 24 नवंबर की सुबह करीब 10:15 बजे सर्वे पूरा होने की घोषणा के बाद भीड़ अचानक उग्र हो गई। कई लोगों ने चेहरे ढक रखे थे। भीड़ ने सर्वे टीम, मजिस्ट्रेट और पुलिस बल को घेरने के साथ पुलिस के हथियार और दंगा नियंत्रण उपकरण लूटने का प्रयास किया।
उपद्रव एकता चौकी, तुर्कटीपुर तिराहा और हिंदूपुरा खेड़ा सहित कई स्थानों तक फैल गया। इस दौरान सरकारी व निजी वाहन, बिजली के ट्रांसफार्मर, केबल, सीसीटीवी कैमरे और अन्य संपत्तियां क्षतिग्रस्त कर दी गईं। हिंसा में पुलिस के 28 अधिकारी-कर्मचारी घायल हुए, जिनमें सात को गोली लगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद पुलिस ने पहले आंसू गैस, फिर मिर्च ग्रेनेड, स्टन ग्रेनेड, रबर बुलेट और पंप एक्शन गन का प्रयोग किया तथा अंत में चेतावनी स्वरूप हवाई फायर किए।
दोपहर लगभग दो बजे तक हालात पर नियंत्रण पा लिया गया। आयोग के अनुसार चारों मृतकों की मौत .315 बोर की गोली लगने से हुई, जबकि पुलिस के पास इस बोर का कोई हथियार नहीं था।
एफएसएल आगरा की बैलिस्टिक और क्राइम सीन री-कंस्ट्रक्शन रिपोर्ट में भी पुलिस द्वारा घातक हथियार के इस्तेमाल की पुष्टि नहीं हुई। मृतकों के परिजनों ने दर्ज एफआईआर में भी पुलिस फायरिंग से मौत का आरोप नहीं लगाया, बल्कि हिंसा के दौरान गोली लगने की बात कही। घटनास्थल के वैज्ञानिक निरीक्षण में विदेशी 12 बोर का खोखा मिला।
जांच के दौरान 199 गवाहों के बयान दर्ज किए गए और मीडिया फुटेज, ड्रोन वीडियो व फोटोग्राफ के आधार पर अन्य लोगों की पहचान होने के बाद आरोपितों की संख्या बढ़कर 107 हो गई। आयोग ने यह भी कहा कि कुछ सार्वजनिक प्रतिनिधियों और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के भड़काऊ व भ्रामक बयानों ने उपद्रवियों को हिंसा के लिए प्रेरित किया।
आयोग की ये रहीं प्रमुख सिफारिशें
आयोग ने भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए संवेदनशील मामलों में जिला प्रशासन, पुलिस और अन्य विभागों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने का सुझाव दिया।
न्यायालय के आदेशों के पालन के दौरान पर्याप्त पुलिस बल, कार्यपालक मजिस्ट्रेट और सुरक्षा व्यवस्था पहले से उपलब्ध कराने तथा आवश्यकता पड़ने पर धारा 163 बीएनएसएस जैसे प्रशासनिक उपाय समय रहते लागू करने की सिफारिश की है।
रिपोर्ट में एलआईयू, साइबर सेल और अन्य खुफिया एजेंसियों से प्राप्त सूचनाओं पर त्वरित कार्रवाई, ड्रोन, सीसीटीवी, मीडिया फुटेज, एफएसएल और बैलिस्टिक जैसे वैज्ञानिक साक्ष्यों का अधिकतम उपयोग, हिंसक स्थिति में न्यूनतम आवश्यक बल के प्रयोग, घायलों के तत्काल उपचार, जांच में प्रत्यक्ष, डिजिटल और वैज्ञानिक साक्ष्यों के समेकित मूल्यांकन तथा दोषियों के विरुद्ध उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कठोर वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है।



