नई दिल्लीराज्‍य

धराली और किश्तवाड़ से भी सबक मिलने की उम्मीद नहीं

सुरेश उपाध्याय

नई दिल्ली : देश ने 2013 की केदारनाथ आपदा से कोई सबक सीखा? नहीं। 2023 की बरसातों में हिमाचल में हुई तबाही से कोई सबक सीखा गया?.जवाब है नहीं। क्या अब धराली और किश्तवाड़ की आपदा से कोई सबक सीखा जाएगा, इसका जवाब भी शायद नहीं ही होगा। इसकी वजह है पैसे की हवस। पैसा कमाना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन अगर पैसे की हवस लोगों की जिंदगी, समाज और पर्यावरण पर भारी पड़ने लगती है तो हालात खतरनाक हो जाते हैं। पिछले कुछ सालों में इस देश के नेताओं, अफसरों और पूंजीपतियों के गठजोड़ ने देश में ऐसे ही खतरनाक हालात पैदा कर दिए हैं। ये पैसे के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं, भले ही इसकी भारी कीमत आम जनता को क्यों न चुकानी पड़े।

धराली में बादल फटा या फिर नदी का बहाव रुकने से आपदा आई, यह स्पष्ट नहीं है। हमारे सैटलाइट भी इस बारे में कोई सूचना नहीं दे पाए। लेकिन खीर गंगा में आई बाढ़ ने धराली में जानमाल का भारी नुकसान कर दिया। यहां 5 अगस्त को नदी में एक के बाद एक बाढ़ की पांच लहरें आईं। नुकसान उन इलाकों में हुआ जो विकास की दौड़ में नदी के किनारे बसा दिए गए। यहां नदी के फ्लड एरिया में बने मकान, होटल और रिजॉर्ट बाढ़ के पानी में तिनके की तरह बह गए। जब यहां नदी में घुसकर मकान, होटल, रिजॉर्ट बनाए जा रहे थे, तब किसी नेता, अधिकारी या मंत्री की नजर इन पर नहीं पड़ी। अब नैनीताल जिले के कैंची धाम में शिप्रा नदी में घुसकर और पहाड़ियों पर बड़े-बड़े होटल रिजॉर्ट बनाए जा रहे हैं और जिले के अफसरों को यह सब नहीं दिख रहा है। ऐसा ही पूरे प्रदेश में हो रहा है।

पिछले दो दशकों से विकास और पर्यटन के नाम पर हिमालयी इलाकों, खासकर हिमाचल और उत्तराखंड में भारी तबाही का सामान जुटाया जा रहा है। उत्तराखंड में पिछले 10 सालों के दौरान 50 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र से जंगल काटे जा चुके हैं। इसकी भरपाई का कोई इंतजाम नहीं किया जा रहा है। यहां सड़कों को अवैज्ञानिक तरीके से चौड़ा किया जा रहा है। इसके लिए विस्फोट किए जा रहे हैं। नतीजतन पहाड़ कमजोर होते जा रहे हैं और भूस्खलन की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। पेड़ कम होने से भी मिट्टी की पकड़ कमजोर हो रही है।

पहाड़ में इस समय पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर बड़े-बड़े होटल, रिजार्ट्स और अन्य प्रोजेक्ट्स बना दिए गए हैं। पहाड़ की जमीन इतना बोझ उठाने में सक्षम नहीं है। बहुत ज्यादा लोगों की आवाजाही बढ़ने से पहाड़ों की जलवायु पर भी असर पड़ रहा है और इससे जो अराजकता फैल रही है, वह अलग है। इस बार भी गढ़वाल में सरकार की ऑल वेदर रोड का जो हाल हो रहा है, वह यह बताने के लिए काफी है कि पहाड़ कितने संवेदनशील हैं। हिमालय का इलाका वैसे भी दुनिया की सबसे नई संरचना है और भूगर्भीय लिहाज से काफी संवेदनशील भी। बावजूद इसके, यहां हजारों बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दी गई हैं और सरकार तथा स्थानीय प्रशासन को यह सब दिखाई नहीं दिया।

शिमला में 2023 में कई बहुमंजिला इमारतों के मालिकों को नोटिस दिया गया, लेकिन उनका कहना था कि उन्होंने नक्शा पास होने के बाद ही निर्माण कराया था। वहीं, उत्तराखंड में तो जमीनों की लूट मची हुई है। बाहरी लोग यहां आकर बड़े पैमाने पर निर्माण करा रहे हैं। मुक्तेश्वर, रामगढ़ के इलाके के साथ ही तमाम जगहों पर ऊंची पहाड़ियों तक पर कई-कई मंजिला इमारतें, होटल और रिजॉर्ट बन गए और कोई देखने वाला नहीं है। किसी को यह नहीं दिख रहा है कि पहाड़ इतना बोझ उठाने के काबिल नहीं हैं। यहां नदी, नालों तक में घुसकर मकान, होटल बनाए जा रहे हैं। पेड़-पौधों का जो नुकसान हो रहा है, वह अलग है।

भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम इलाकों में क्लाइमेट चेंज बड़ी तबाही लेकर आ रहा है। इसकी वजह से कहीं बादल फट रहे हैं तो कहीं भारी बाढ़, बारिश और गर्मी देखी जा रही है। हिमाचल में इस साल बरसात शुरू होने के बाद से अब तक 30 जगह बादल फट चुके हैं। हाल के सालों में बादल फटने की बड़ी घटना 2010 में लेह में हुई थी। इसके कारण वहां भारी तबाही हुई। इसके बाद तो देश में अब तक सैकड़ों जगह बादल फट चुके हैं। इससे पहले देश में इस तरह की घटनाएं बहुत कम हुई थीं। चीन, अमेरिका, रूस और कई अन्य देशों में भी असामान्य बारिश और भूस्खलन से खासा नुकसान हुआ है। यूरोप के कई देश गर्मी से बेहाल हैं। यानी कि क्लाइमेट में बदलाव पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या बन रहा है और इससे निपटने के लिए सभी देशों को प्रयास करने होंगे। विकास और निर्माण नीतियों की समीक्षा करनी होगी।

विशेषज्ञ हिमालयी क्षेत्र में बादल फटने की घटनाएं बढ़ने का एक बड़ा कारण यहां बनाए गए बेहिसाब डैम्स को भी मानते हैं। उनका कहना है कि इन डैम्स के कारण पानी के वाष्पीकरण की रफ्तार बढ़ रही है और इलाका ठंडा होने के कारण ये हिमालयी क्षेत्र में ही फट जा रहे हैं। हिमाचल में अब तक 365 डैम्स बना दिए गए हैं। इसी तरह उत्तराखंड में भी बिजली बनाने के नाम पर बड़ी संख्या में डैम्स बना दिए गए हैं।

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