
देहरादून। उत्तराखंड की फिल्म नीति का असर अब प्रदेश के स्थानीय सिनेमा पर भी दिखाई देने लगा है। राज्य में हिंदी फिल्मों और वेब सीरीज की शूटिंग बढ़ने के साथ गढ़वाली, कुमाऊंनी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को भी प्रोत्साहन मिल रहा है। इससे स्थानीय कलाकारों, निर्देशकों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए अपने ही प्रदेश में काम के अवसर बढ़ रहे हैं।
पहले अभिनय और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए युवाओं को अक्सर मुंबई जैसे बड़े शहरों का रुख करना पड़ता था। अब उत्तराखंड में फिल्म निर्माण की गतिविधियां बढ़ने से उन्हें स्थानीय स्तर पर भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल रहा है।
फिल्म नीति से मिल रही आर्थिक सहायता
राज्य सरकार की फिल्म नीति-2024 के तहत फिल्म निर्माताओं को निर्धारित शर्तों के अनुसार आर्थिक सहायता दी जा रही है। हिंदी और संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं की फिल्मों के लिए उत्तराखंड में किए गए पात्र खर्च का 30 प्रतिशत या अधिकतम तीन करोड़ रुपये तक अनुदान का प्रावधान है। वहीं, स्थानीय फिल्मों को 50 प्रतिशत तक सब्सिडी देने की व्यवस्था है।
इस नीति का उद्देश्य प्रदेश में फिल्म निर्माण को बढ़ावा देना, स्थानीय कलाकारों को रोजगार उपलब्ध कराना और उत्तराखंड को शूटिंग के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करना है।
स्थानीय फिल्मों के निर्माण में तेजी
प्रदेश में क्षेत्रीय फिल्मों के निर्माण को भी नई गति मिली है। गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषा की फिल्मों के जरिए स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और जनजीवन को पर्दे पर प्रस्तुत किया जा रहा है। नए कलाकारों और निर्देशकों को भी अपनी कहानियां दर्शकों तक पहुंचाने का मौका मिल रहा है।
फिल्म निर्माण से केवल कलाकारों को ही नहीं, बल्कि कैमरा ऑपरेटर, मेकअप आर्टिस्ट, तकनीशियन, स्थानीय प्रोडक्शन टीम, होटल और परिवहन कारोबार से जुड़े लोगों को भी काम मिलता है।
पर्यटन और रोजगार को मिलेगा बढ़ावा
उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ी गांव, नदियां और ऐतिहासिक स्थल फिल्म निर्माताओं को आकर्षित करते हैं। प्रदेश में शूटिंग बढ़ने से पर्यटन को प्रोत्साहन मिलने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ पहुंचने की संभावना है।
सरकार की फिल्म नीति और स्थानीय प्रतिभाओं की भागीदारी से प्रदेश में क्षेत्रीय सिनेमा को आगे बढ़ाने की उम्मीद है। आने वाले समय में इससे युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं और उत्तराखंड की भाषा, संस्कृति तथा लोकजीवन को व्यापक पहचान मिल सकती है।



