
सुरेश उपाध्याय
नई दिल्ली ः उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का 2025 तक राज्य को ड्रग्स फ्री बनाने का वादा था, लेकिन उसके पूरे होने के आसार अब भी नजर नहीं आ रहे हैं। प्रदेश के तमाम इलाकों में अब भी ड्रग्स का कारोबार और अवैध शराब की तस्करी जारी है। सरकार इस मामले में कितनी संजीदा है, इसका अंदाजा कुछ महीने पहले हुआ अल्मोड़ा के एसएसपी देवेंद्र पींचा का तबादला है।
पींचा को एक ईमानदार और कर्मठ अधिकारी माना जाता है। उन्होंने अपने कार्यकाल में जिले में ड्रग्स के खिलाफ जबरदस्त मुहिम छेड़ी थी। जिले के दूरदराज इलाकों से भी तब बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ बरामद किए गए थे और कई तस्करों को जेल भेजा गया था। पींचा को उनकी मेहनत को इनाम मिला और उन्हें रुद्रपुर में पीएसी में फेंक दिया गया। कहा जाता है कि ड्रग्स माफिया के दबाव में उन्हें हटाया गया। इसके बाद से राज्य में ड्रग्स के खिलाफ मुहिम एक तरह से ठंडी सी पड़ गई है।
अब उत्तराखंड में 1980 के दशक में शुरू हुए ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन में एक बार फिर से जान फूंकने की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है। इस आंदोलन से राज्य में शराब माफिया के खिलाफ बड़े पैमाने पर मुहिम शुरू हुई थी और युवाओं को शराब की जगह रोजगार दिलाने के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन हुए थे। लोग अब शराब के साथ ही ड्रग्स के काले कारोबार का खात्मा करने के लिए बड़े पैमाने पर मुहिम की जरूरत महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि स्मैक और अन्य ड्रग्स के जरिए बड़े सुनियोजित तरीके से राज्य की युवा पीढ़ी को बर्बाद किया जा रहा है और राज्य सरकार और इसके अफसर कार्रवाई के नाम पर महज रस्म अदायगी कर रहे हैं। कई लोग राज्य में ड्रग्स की सप्लाई को ड्रग जिहाद तक करार देते हैं। उनका कहना है कि इसका मकसद राज्य की युवा पीढ़ी को बर्बाद करके यहां की जमीनों पर कब्जा करना और यहां के मूल निवासियों को अल्पसंख्यक बनाना है।
गौरतलब है कि अभी हाल के सालों तक राज्य में नशे के लिए शराब और भांग-गांजे आदि का सेवन किया जाता था और इनको ज्यादा खतरनाक नहीं माना जाता था। लेकिन अब पंजाब और देश के कुछ अन्य राज्यों की तरह ही उत्तराखंड में स्मैक और सिंथेटिक ड्रग्स का कारोबार करने वालों का जाल फैल गया है। इस जाल को खत्म करने और ड्रग्स की सप्लाई जड़ को समाप्त करने में राज्य का सारा सिस्टम फेल हो रहा है। हालात को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 2022 में एक उच्चस्तरीय बैठक करके 2025 तक राज्य से ड्रग्स के काले कारोबार को खत्म करने का निर्देश अपने अधिकारियों को दिया था, लेकिन 2026 में भी राज्य ड्रग्स के काले कारोबार से मुक्त नहीं हो पाया है। सूत्रों का कहना है कि फिलहाल राज्य की पुलिस जिस तरह से काम कर रही है, उसे देखते हुए यह काम हो पाएगा, ऐसा लगता नहीं है। राज्य के किसी भी जिले का शायद ही ऐसा कोई कोना बचा हो, जहां ड्रग्स न पहुंच रही हों।
कुमाऊं मंडल के पुलिस महानिरीक्षक रहे अजय रौतेला के मुताबिक, इस क्षेत्र में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, पंजाब होते हुए बरेली से ड्रग्स की सप्लाई होती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुमाऊं के मुनस्यारी, धारचूला, जौलजीबी, देघाट और सल्ट जैसे दुर्गम इलाकों तक में ड्रग्स बिना किसी दिक्कत के पहुंच रही हैं और युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है। ड्रग्स के लिए पैसे जुटाने के लिए वह अपराध के रास्ते पर बढ़ रही है। इसी तरह गढ़वाल के भी तकरीबन हर हिस्से में ड्रग्स की सप्लाई हो रही है। गढ़वाल में पंजाब, पोंटा साहिब से होते हुए ड्रग्स देहरादून पहुंच रही हैं और वहां से पूरे मंडल में। एक स्थानीय शख्स ने बताया कि पहाड़ की युवा पीढ़ी को स्मैक ने बर्बाद कर दिया है। यहां युवा लड़के ही नहीं, लड़कियां तक बड़ी तादाद में स्मैक की चपेट में आ गई हैं।



