उत्तर प्रदेशराज्‍य

किसी धर्म को ‘एकमात्र सच्चा धर्म’ बताना, अन्य धर्मों का अपमान; हाईकोर्ट की टिप्पणी

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि धर्मनिरपेक्ष भारत में किसी भी व्यक्ति का यह दावा बिल्कुल ‘गलत’ है कि कोई विशेष धर्म ही ‘एकमात्र सच्चा धर्म’ है, क्योंकि ऐसा करने से अन्य धर्मों का ‘अपमान’ होता है और प्रथम दृष्टया यह आईपीसी की धारा 295 ए के अंतर्गत अपराध है।

इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने मऊ के रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा की वह याचिका खारिज कर दी है, जिसमें केस कार्यवाही रद किए जाने की मांग थी। याची के खिलाफ जानबूझकर दुर्भावनापूर्ण कृत्य करने, किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से उसके धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान के तहत आरोप है।

अभियोजन का दावा है कि अभियुक्त ने प्रार्थना सभाओं में अक्सर कहा कि ईसाई धर्म ही एकमात्र सही धर्म है, इससे विशेष धर्म, अर्थात् हिंदू धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंची। प्रारंभिक जांच के दौरान जांच अधिकारी ने यह निष्कर्ष निकाला कि कोई अवैध मतांतरण नहीं हुआ था, फिर भी पुलिस ने अन्य धर्मों की आलोचना करने के आरोपों के संबंध में आरोप पत्र दाखिल करने की कार्यवाही आगे बढ़ाई।

याची के वकील ने तर्क दिया कि आईपीसी की धारा 295ए के तहत कोई अपराध नहीं बनता। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने न्यायिक विवेक का प्रयोग किए बिना और पर्याप्त सहायक साक्ष्यों के बिना आरोपपत्र का संज्ञान लिया है। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि साक्ष्यों के मूल्यांकन की आवश्यकता है।

संज्ञान लेने के चरण में, निचली अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है अथवा नहीं और उससे लघु-परीक्षण करने की अपेक्षा नहीं की जाती। दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति श्रीवास्तव ने कहा, भारत ऐसा देश है जहां संविधान द्वारा परिभाषित धर्मनिरपेक्ष राज्य में सभी धर्मों और विश्वासों के लोग एक साथ रहते हैं।

इसलिए किसी भी धर्म के लिए यह दावा करना गलत है कि वह एकमात्र सच्चा धर्म है क्योंकि यह अन्य धर्मों का अपमान दर्शाता है। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 295ए की पहली पंक्ति विशेष रूप से किसी भी वर्ग के नागरिक की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादों से संबंधित है, जिसमें उसके धर्म या धार्मिक आस्था का अपमान शामिल है।

आगे कहा कि, इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट को केवल रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया राय दर्ज करनी होती है, न कि प्रारंभिक चरण में लघु परीक्षण करना या आरोपित के बचाव की जांच करना।

यह पाते हुए कि आवेदक द्वारा प्रस्तुत सभी दलीलें विवादित तथ्यों से संबंधित हैं जिनका निर्णय धारा 528 बीएनएसएस के तहत नहीं किया जा सकता, कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। याची के खिलाफ वर्ष 2023 में थाना मुहम्मदाबाद में केस दर्ज किया गया था।

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